प्राचीन भारत का इतिहास

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अतीत के अध्ययन हेतु काल विभाजन

प्रागैतिहासिक काल जिस काल का मानव किसी प्रकार की लिपि अथवा लेखन कला से परिचित नहीं था। मानव उत्पत्ति से लेकर लगभग 3000ई.पू. के बीच का समय इसके अन्तर्गत आता है पाषाण काल एवं पाषाण काल का अध्ययन इसी के अन्तर्गत किया जाता है।

  1. आतिहासिक काल जिस काल का मानव किसी न किसी प्रकार की लिपि से परिचित था लेकिन वह लिपि अभी तक पढ़ी न गई तो सभ्यता एवं सभ्यता का अध्ययन इसी के अन्तर्गत किया जाता है।
  2. ऐतिहासिक काल जिस काल का मानव किसी न किसी प्रकार की लिपि से परिचित था और वह लिपि पट्टी जा चुकी हो अर्थात् मानव के जिन क्रिया-कलापों का हमें लिखित विवरण प्राप्त होता है और वह विवरण पढ़ा जा चुका हो उसे हम इतिहास कहते हैं 5वीं शताब्दी ई. पू. से लेकर वर्तमान तक का अध्ययन इसी के अन्तर्गत किया जाता है।

प्रागैतिहासिक काल

पाषाण काल

● भारत में सर्वप्रथम 1863 ई. में पाषाण कालीन सभ्यता की खोज की गई।

• राबर्ट ब्रूस फुट (भू-वैज्ञानिक) ने पहला पुरा पाषाण कालीन

उपकरण मद्रास के पास पल्लवरम् नामक स्थान से प्राप्त पाषाण काल को अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से तीन कालों में विभाजित किया गया है।

  1. पुरा पाषाण काल (5 लाख ई.पू. से 10 हजार ई.पू.) सोहन उद्योग के नाम से जाना जाता है। 2. मध्य पाषाण काल ( 10 हजार ई.पू. से 4 हजार ई.पू.) 3. नवपाषाण काल ( 7 हजार ई.पू. से 1 हजार ई.पू) पुरा पाषाण काल को अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से पुन: तीन कारणों में विभाजित किया गया है।

निम्न पुराणकाल

• इस काल में मानव जीवन अस्थिर था शिकार करके वह

●अपना भोजन संग्रह करता था।

● इस काल के उपकरणों में हैंड ऐक्स, चापर चापिंग एवं पेल उपकरण मुख्य थे।

भारत की निम्न पुरापाषाण कालीन संस्कृति को दो वर्गों में विभाजित किया गया है।

चापर-चापिग पेबुल संस्कृति

• यह संस्कृति पाकिस्तान के पंजाब में सोहन नदी घाटी में सर्वप्रथम प्रकाश में आयी। अतः इसे सोहन संस्कृति या सोहन उद्योग के नाम से जाना जाता है।
इस संस्कृति का मुख्य उपकरण हैंड ऐक्स है। इसे एश्यूलन संस्कृति के नाम से जाना जाता है।

• इस संस्कृति के उपकरण सर्वप्रथम मद्रास के निकट अतिरमपम्का से प्राप्त हुए हैं। इसीलिए इसे मदासी संस्कृति या मद्रासी उद्योग के नाम से जाना जाता है।

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